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Laal Bahadur Shastri : लाल बहादुर शास्त्री आइए जानते है भारत के दितीय लेकिन अदितीय प्रधान मंत्री के बारे में

लाल बहादुर शास्त्री

लाल बहादुर शास्त्री आजाद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे शान्त स्वभाव के दिखाने वाले शास्त्री जी अंदर से उतने ही मजबूत थे वो जब कोई निर्णय ले लेते तो उस पर अडिग रहते थे उनके कार्यकाल में ही भारत ने पाकिस्तान को जंग में हरा दिया था उनका दिया नारा जय जवान जय किसान  देश वासियों को देश भक्ति की भावना से भर दिया था नतीजा भारत ने 1965 के युद्ध में हरा दिया था और खुद पाकिस्तान ने भी ये नही सोचा था की वो हार जाएगा क्यों की उससे पहले चीन ने 1962 में भारत को हराया था  तो आइए जानते है भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के जन्म, परिवार , बच्चे,  , स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने और प्रधान मंत्री बनने और पाकिस्तान को हराने की कहानी हमारे ब्लॉग पोस्ट में तो आइए जानते है 
LaalBahadurShastri



जन्म 


 श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को   वाराणसी से  16 किलोमीटर   दूर , मुगलसराय में हुआ था। उनके पिता मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव  एक स्कूल शिक्षक थे। और माता राम दुलारी गृहणी थी , जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया   उनकी माँ अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर मिर्जापुर में  जाकर बस गईं 

उस छोटे-से शहर में लाल बहादुर की स्कूली शिक्षा कुछ खास नहीं रही लेकिन गरीबी की मार पड़ने के बावजूद उनका बचपन पर्याप्त रूप से खुशहाल बीता। 

बाद में उन्हें वाराणसी में उनके चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया था ताकि वे उच्च   शिक्षा प्राप्त कर सकें। घर पर सब उन्हें नन्हे के नाम से पुकारते थे। वे कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर विद्यालय जाते थे, यहाँ तक की भीषण गर्मी में जब सड़कें अत्यधिक गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था। 

शिक्षा 


प्राथमिक शिक्षा मिर्ज़ापुर में ही हुई एवम आगे का अध्ययन हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी-विद्यापीठ में हुआ. लाल बहादुर जी ने संस्कृत भाषा में स्नातक किया था. संस्कृत में स्नातक की डिग्री को ही शास्त्री कहा जाता था जिसे इन्होंने ने अपने नाम से जोड़ लिया  और बाद में शास्त्री को लोग इनके नाम का ही भाग समझने लगे . इस वक्त के बाद से  ही लोग लाल बहादुर  को लाल बहादुर शास्त्री के नाम से जानने लगे 

देश के प्रति जज्बा


जैसे जैसे शास्त्री  जी बड़े होने लगे उनमें देश के प्रति कुछ करने का जज्बा भी जागने लगा और लाल बहादुर शास्त्री अंग्रेजी शासन से आजादी के लिए देश के संघर्ष में अधिक रुचि रखने लगे। जब भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की  निंदा की गई तो शास्त्री जी इससे अत्यंत प्रभावित हुए। शास्त्री जी  जब केवल 11 साल के थे तभी उन्होंने राष्ट्रीय स्तर देश के लिए  कुछ करने का मन बना लिया था। 

शादी 


लाल बहादुर शास्त्री जी की शादी 1927 में शादी हो गई। उनकी पत्नी ललिता देवी मिर्जापुर से थीं जो उनके अपने शहर के पास ही था। उनकी शादी एक दम पारंपरिक शादी थी। दहेज के नाम पर एक चरखा एवं हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े ही उन्हें मिले थे 


परिवार में 

शास्त्री जी के परिवार में  पत्नी ललिता देवी थी  और   6 बच्चे थे जिनमे  4 लड़के, 2 लड़कियां है इनके एक लड़के अनिल शास्त्री कांग्रेस में सक्रिय भी थे 



स्वतंत्रता आंदोलन में भाग 



जब गांधी जी ने 1920 में  असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए देशवासियों से आह्वान किया था, इस समय लाल बहादुर शास्त्री केवल 16 साल के थे। उन्होंने गांधी जी  के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था।  इस निर्णय ने उनकी मां की उम्मीदें तोड़ दीं। 

 परिवार ने उनके इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन परिवार को इसमें असफलता मिली । लाल बहादुर शास्त्री जी ने अपना मन बना लिया था। परिवार के  लोगों को यह पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अन्दर से चट्टान की तरह दृढ़ और सख्त है 
  शास्त्री जी ने 1921 असहयोग आंदोलन में फिर 1930 में नमक आंदोलन किया और दांडी  यात्रा निकाली तो शास्त्री जी ने इसमें भी बढ़ चढ़ का हिस्सा लिया  

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में इन्होंने नारा दिया था  करो या मरो  1942 में ही नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी  ‘आजाद हिन्द फ़ौज’ का गठन कर उसे “दिल्ली-चलो” के नारे के साथ दिल्ली चलाने का आह्वाहन किया   और  8 अगस्त 1942 में गाँधी जी के ‘भारत-छोडो आन्दोलन’ ने भी रफ्तार पकड़ ली इसी दौरान शास्त्री जी ने भारतीयो को जगाने के लिए “करो या मरो” जो  नारा दिया, उसको 9 अगस्त 1942 को इलाहबाद में इस नारे को परिवर्तन कर इसे “मरो नहीं मारो” कर देश वासियों का आव्हान किया . फिर अंग्रेजी सरकार इनके पीछे पड़ गई और ये छुप कर रहने लग गए  शास्त्री जी ग्यारह दिन छुप छुप कर रहे, फिर 19 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिए गये. फिर जेल भेज दिए गए शास्त्री जी स्वतंत्रता संग्राम के परिधि में करीब सात साल कुल मिलाकर जेल में रहे 

आजादी के बाद राजनीतिक जीवन 


जब देश अंग्रेजो की गुलामी से आजाद हो गया और कांग्रेस सरकार का गठन हुआ तब इनके महत्व को समझते हुए इन्हें उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और अपने कार्यों की बदौलत जल्द ही ये उत्तर प्रदेश सरकार में गृह मंत्री बनाए गए उनके कार्यों को देखते हुए इन्हें  अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का महासविव बनया गया और केंद्रीय मंत्री मंडल में इनको जगह दी गई इन्होंने कई विभागों का प्रभार संभाला – रेल मंत्री; परिवहन एवं संचार मंत्री; वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री; गृह मंत्री 
 
उन्हीं के कार्यकाल में देश में पहली बार किसी महिला को बस कंडक्टर के पद पर नियुक्त किया गया था। 

लाठीचार्ज की जगह वाटरकैनन का इस्तेमाल उन्हीं का आइडिया था

जब शास्त्री जी रेल मंत्री थे तो एक रेल दुर्घटना के बाद जिसमें कई लोग मारे गए थे, के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। देश एवं संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की। उन्होंने कहा कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी 

लाल बहादुर शास्त्री जी मंत्रालय के अपने कामकाज को देखते हुए भी भी वे कांग्रेस पार्टी के सभी मामलों और चुनावी रैलियां और चुनाव को देखते रहे एवं उसमें अपना भरपूर योगदान दिया। 1952, 1957 एवं 1962 के आम चुनावों में पार्टी की निर्णायक एवं जबर्दस्त सफलता में उनकी सांगठनिक प्रतिभा एवं चीजों को नजदीक से परखने की उनकी अद्भुत क्षमता का बड़ा योगदान था 

प्रधानमन्त्री


अपने कार्यकाल के दौरान पहले प्रधान मंत्री  नेहरु जी की मृत्यु हो जाने के कारण 9 जून 1964 को शास्त्री जी को इस पद पर मनोनित किया गया ये आजाद भारत के दूसरे प्रधान मंत्री थे परन्तु इनका कार्यकाल बहुत कठिन था. पाकिस्तान ने 1965 में सांय 7.30 बजे   भारत पर हवाई हमला कर दिया. इस परिस्थिती में  तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधा कृष्णन ने बैठक बुलवाई. इस बैठक में तीनो रक्षा विभाग के प्रमुख एवम शास्त्री जी सम्मिलित हुए. विचार-विमर्श के दौरान प्रमुखों ने लाल बहादुर शास्त्रों को सारी स्थिती से अवगत कराया और उनके प्रधान मंत्री के आदेश की प्रतीक्षा की

 तब ही शास्त्री जी ने जवाब में कहा “आप देश की रक्षा कीजिये और मुझे बताइए कि हमें क्या करना है?” इस तरह भारत-पाक युद्ध के दौरान विकट परिस्थितियों में शास्त्री जी ने सराहनीय नेतृत्व किया और “जय-जवान जय-किसान” का नारा दिया, जिससे देश में एकता आई और भारत ने  पाकिस्तान को हरा दिया 

लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु  

जब साल 1965 की जंग जब पाकिस्तान हार गया तब अमेरिका के दबाव पर शास्त्री जी शान्ति-समझौते पर हस्ताक्षर करने हेतु पकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान से रूस की राजधानी ताशकंद में मिले. कहा जाता है, उन पर दबाव बनाकर हस्ताक्षर करवाए गए. समझोते की रात को ही 11 जनवरी 1966 को उनकी रहस्यपूर्ण तरीके से मृत्यु हो गई.

भारत रत्न 


लाल बहादुर शास्त्री मरणोपरांत देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ 1966 दिया गया भारत रत्न  पाने वाले  शास्त्री जी पहले व्यक्ति थे

कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर 


Q1- लाल बाहदुर शास्त्री का जन्म कब हुआ था ? 

Ans- लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को हुआ था 

Q2- लाल बहादुर शास्त्री जी प्रधान मंत्री कब बने थे ?

Ans -  9 जून 1964 को लाल बहादुर शास्त्री जी प्रधान मंत्री बने थे 

Q3- लाल बहादुर शास्त्री को शास्त्री उपनाम कैसे मिला ?

Ans- लाल बहादुर शास्त्री जी को शास्त्री उपनाम उनके स्नातक में शास्त्री डिग्री मिलने के कारण मिला था 

Q4- लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु कब हुई थी ?
 
Ans- लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु 11 जनवरी 1966 को  रहस्यपूर्ण तरीके से हुई थी 

Q5- लाल बहादुर शास्त्री जी ने कौन कौन से नारे दिए थे ? 

Ans- लाल बहादुर शास्त्री जी ने करो या मरो , मरो नही मरो और जय जवान जय किसान का नारा दिया था उनके नारे लोगो में आत्मविश्वास जागते थे 



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आप यह भी पढ़ सकते हैं नरेंद्र मोदी

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